✍️ गिरिराज कुमार काबरा
हिंदुस्तान की सुसंस्कृत भूमि पर नारी सदैव पुज्या रही है।सनातन संस्कृति में आदि अनादि काल से नारी को शक्ति ऐश्वर्य और विद्या की देवी के रूप में प्रतिस्थापित कर नारी को जो सांस्कृतिक श्रेष्ठता का आवरण इस भूमि पर प्रदान किया वह अन्यत्र किसी भी भू–खंड पर देखने को नहीं मिलेगा ।
विदेशी बर्बर और असभ्य जातियो के आक्रमण और भारत में प्रवेश के साथ उनके मानसिक दुष्प्रभावों से नारी की गरिमा और सम्मान दोनों की हानि प्रारम्भ हुई जो सतत आज तक अनवरत है ।
पुरुष वर्ग नारी के सम्मान,रक्षा, सुरक्षा को अपना नैतिक कर्तव्य और धर्म मानता था वहीं नारी भी अपने सम्मान को बचाने के लिए कभी जोहर करती थी तो कभी जल समाधि ले कर पवित्र अंनत में विलीन हो जाती थी तो कभी स्वयं रण क्षेत्र में उतर कर लड़ी और मरी पर दामन पर कलंक स्वीकार नहीं किया ।
विडंबना देखिए आज उसी भूमि पर महिलाएं पुरूषों से सुरक्षित भी नहीं है तो कुछ स्वयं आधुनिक दिखने की चाह में अपना सांस्कृतिक धरातल दरअसल छोड़ चुकी है पहनावे से लेकर विचारों तक जो उन्मुक्तता हो या सार्वजनिक रूप से नशा करती अश्लीलता परोसती तस्वीरें ये सब आग में घी का काम करती है ।
ये सब सांस्कृतिक मिलावट का नतीजा है पाश्चयात संस्कृति के प्रभाव में आज के युवा स्वच्छंदता को श्रेष्ठ मानने लगा है यह सब उसी के दुष्परिणाम है कि देश में लगातार नारी उत्पीड़न बलात्कार यौन हिंसा जैसी घटनाएं चरम पर है ।
राक्षस खुले घूम रहे हैं उन्हें किसी सत्ता का भय है ना उन्हें कानून का डर बस एक ही लक्ष्य केसे भूख मिटे ?
सनातन हिंदुस्तान में बेटी के जन्म को देवी का अवतरण माना जाता था पर आज के इस भारत में बेटी के जन्म के साथ उसके सुरक्षा की चिंता सताती है।
परिस्थितियों का यही बदलाव चिंतनीय निंदनीय है ।
अगर हमें नारी के सम्मान को सुरक्षित करना है तो पुनः अपनी संस्कृति के और लौटना होगा ।
पहले की अपेक्षा जितना शिक्षा का प्रसार हुआ उससे ज्यादा संस्कारो का अवसान हुआ संस्कार रहित उस शिक्षा का क्या महत्व जो मानव को मानव न बना सकें ।
नारी सम्मान शिक्षा से नहीं संस्कारों से आता है ।
मनु स्मृति में वर्णित है..........
यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः ।
यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः ।।
अर्थात जहां पर नारी को पूजा जाता है वहां स्वयं देवता निवास करते हैं और जहां नारी की पूजा नहीं होती है वहां पर सभी सत्कर्म व क्रियाएं भी फल रहित हो जाती है ।
आइए इस नवरात्रा हम एक पवित्र संकल्प लें कि हम पुनः हमारी संस्कृति से जुड़े और नारी के गौरव और सम्मान की पुनर्स्थापना करें।
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